पेहले मै दिन रात बहोत भंजळलेला रेहता था। घर में बायको और ऑफिस में म्यानेजर हमेशा वैतागलेले रेहते थे। मै अपने बच्चों को (एकचे पण तरी) समय नही दे पाता था। मेरा पुरा रुटीन 'रात्र थोडी और सोंगं फार' हो गया था। दिन में तीन-चार बार अपनी मोबाईल की बॅटरी चार्ज करनी पडती। यूं कहो के मेरा मोबाईल वायर से जोडा हुवा लँड लाईन बन गया था।
फिर एक दिवस मेरी ओळख अमेरिका के वर्ल्ड फेमस डॉ. झुकरबर्ग से हुवी। उन्होने समझाया के "प्रत्येक का डोका एक कॉप्युटर सारखा काम करता है। प्रोसेसर कमी कॅपॅकिटी का होने के कारण लै विंडो ओपन रखने से ये तनाव हो सकता है। थोड्या विंडो बंद करो।"
उन्न के म्हंणेनुसार मैं फेसबुक पे लै वेळ घालव रहा था। दिल पे दगड रख के मैंने मेरा फेसबुक अकाऊंट बंदच कर दिया। शुरु में कुछ दिन एकदमच चुकल्या चुकल्यासारखं वाट्या। क्या करावं हेच समझ में नही आ रहा था। नंतर हळू हळू डोका शांत होने लगा।
अब मैं बायको के साथ संध्याकाळी चक्कर मारने जाता हुँ। बच्ची को कुशी में बिठा के गोष्ट सुनाता हुँ। ऑफिस के सगळे काम एकदम वेळेवर करता हुँ। इस डिएक्टिव्ह ने जैसे मेरे आयुष्य में एक नया बदलाव आ गया है। आप भी जरूर प्रयत्न करके देखीयेगा।
फेसबुक डिएक्टिव्ह विकल्प से संतुष्ट ग्राहक,
प्रणवचन्दर जतकर
बैंक मैनेजर
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अब मैं बायको के साथ संध्याकाळी चक्कर मारने जाता हुँ। बच्ची को कुशी में बिठा के गोष्ट सुनाता हुँ। ऑफिस के सगळे काम एकदम वेळेवर करता हुँ। इस डिएक्टिव्ह ने जैसे मेरे आयुष्य में एक नया बदलाव आ गया है। आप भी जरूर प्रयत्न करके देखीयेगा।
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